पेड़ों का सफल ट्रांसप्लांट


हिसार- अब सड़क के आड़े आने वाले पेड़ों को काटने की जरूरत नहीं है। ट्रांसप्लांट तकनीक से उन्हें दूसरे स्थान पर सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है। राजस्थान में खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले बिश्नोई समाज के जनक गुरु जंभेश्वर महाराज के नाम से विख्यात गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (गुजविप्रौवि) ने इस तकनीक का इस्तेमाल कर पेड़ों को ट्रांसप्लांट करने का करिश्मा कर दिखाया है। इस तकनीक से विश्वविद्यालय के हार्टीकल्चर विभाग ने दो चरणों में खजूर के 38 पेड़ सफलता से ट्रांसप्लांट किए हैं। इसके अलावा सड़क निर्माण के आड़े आ रहे करीब 25 अन्य पेड़ों को भी ट्रांसप्लांट करने का कार्य जारी है। दरअसल पर्यावरणवादी संत के नाम से जुड़े इस विश्वविद्यालय में आधुनिक पर्यावरण संरक्षण की शुरुआत गत अप्रैल माह में तब हुई, जब विश्वविद्यालय प्रशासन नेक (नेशनल एक्रिडीशन काउंसिल) की टीम के स्वागत की तैयारियों में जुटा हुआ था। विश्वविद्यालय को फिर से ए ग्रेड दिलाने के लिए हर क्षेत्र में सुधार किया गया लेकिन नए विश्वविद्यालय में
पेड़ों से ज्यादा संख्या पौधों की थी। इसी दौरान विश्वविद्यालय के कुलपति डा. डीडीएस संधू ने एक खबर पढ़ी की चीन में पेड़ों को ही ट्रांसप्लांट कर दिया जाता है। इस पर उन्होंने विश्वविद्यालय के कार्यकारी अभियंता एवं हार्टीकल्चर विभाग के अध्यक्ष अशोक अहलावत से बात की। इसके बाद अहलावत ने इस पर काम शुारू किया। उन्होंने विश्वविद्यालय के जंगल में खड़े 25 से 30 वर्ष पुराने खजूर के 18 पेड़ों को ट्रांसप्लांट करवाया। यह कार्य इस वर्ष 5 अप्रैल से शुरू हुआ और लगभग एक सप्ताह में पूरा कर लिया गया। पेड़ों का ट्रांसप्लांट पूरी सफल रहता है या नहीं, यह स्पष्ट होने में करीब छह माह का समय लग जाता है। ट्रांसप्लांट किए गए 18 पेड़ों में 15 हरे-भरे शान से खड़े हैं। इसके बाद सिंतबर माह में खजूर के 20 और पेड़ों को ट्रांसप्लांट किया गया। यह कार्य 20 सितंबर से शुरू हुआ और करीब 10 दिनों में पूरा कर लिया गया। इस चरण की सफलता के बारे में पूरी तरह जानकारी तो मार्च, 2010 में चल पाएगी लेकिन अभी इनमें से सारे पेड़ सुरक्षित व अच्छी हालत में हैं। इसके बाद जब विश्वविद्यालय के गेट नंबर तीन से प्रशासनिक भवन तक सड़क चौड़ी करने का काम शुरू हुआ तो इस काम के आड़े भी 25 पेड़ आ गए। चूंकि पेड़ों को काटना उचित नहीं होता, इसलिए इन पेड़ों को भी अब ट्रांसप्लांट किया जा रहा है। यह काम अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में शुरू हुआ है और दिसंबर के अंत तक इसके पूरा हो जाने की उम्मीद है। नए विवि में पुराने पेड़ : संधू विवि कुलपति डा. डीडीएस संधू ने बताया कि गुजविप्रौवि प्रदेश का सबसे नए विश्वविद्यालयों में है, लेकिन पुराने पेड़ों के बिना अच्छा लुक नहीं आ सकता। दूसरी तरफ विश्वविद्यालय का नाम भी पर्यावरण के संरक्षक के नाम पर है, इसलिए यहां पर पेड़ काटना भी ठीक नहीं। इसी जद्दोजहद के दौरान उनकी नजर जब चीन में पेड़ ट्रांसप्लांट की खबर पर पड़ी तो उन्होंने हार्टीकल्चर विभाग से बात की और अशोक अहलावत ने वह काम करके दिखा दिया। इंटरनेट से सीखी तकनीक : अहलावत विश्वविद्यालय के हार्टीकल्चर विभाग के प्रधान एवं कार्यकारी अभियंता अशोक अहलावत ने बताया कि वह अब तक खजूर के 18 पेड़ ट्रांसप्लांट कर चुके हैं तथा अब अशोका, महानीम, नीम व बड़ के पेड़ों को ट्रांसप्लांट करने का काम चल रहा है। उन्होंने बताया कि यह सारा कार्य उन्होंने इंटरनेट की मदद से ट्रांसप्लांट की तकनीक पढ़कर किया है।

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