ए.बी.सी.डी. से नाता नहीं और नाम है इंगलिश गांव

चौकिए नहीं, यह इंगलिश गांव है। सरकारी दस्तावेजों में भी इसका यही नाम है। जिला मुख्यालय से तकरीबन 17 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस गांव की ख्याति महज नाम के चलते ही है। यहां पहुंचते ही इसकी काली तस्वीर खुद सामने आ जाती है। लगभग बारह सौ की आबादी वाले इस गांव में महज दो ग्रेजुएट हैं, वह भी इत्तफाकन। तीस फीसदी लोग ही अक्षर से परिचित हैं। अमरपुर प्रखंड के इंगलिश गांव की जीवन शैली भी देहाती ही नहीं ठेठ देहाती है। नाम के विपरीत यहां की दशा शैक्षिक विकास की पोल भी खोल रही है। जिला शिक्षा पदाधिकारी के अनुसार शैक्षिक विकास के लिए हर आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। इसका प्रतिफल भी सामने आया है और अब इस गांव के शत प्रतिशत बच्चे स्कूल जा रहे हैं। परंतु यहां शिक्षा केन्द्र के नाम पर महज एक प्राथमिक विद्यालय है। इसके बाद की शिक्षा के लिए बच्चों को तीन किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। गरीबी की मार से बेहाल यहां के लोग बच्चों को मैट्रिक तक की शिक्षा देने के बजाय दिल्ली व पंजाब सहित अन्य शहरों में काम के लिए भेजना ज्यादा मुनासिब समझते हैं। फलाफल यहां मैट्रिक पास छात्रों की संख्या भी अंगुलियों पर गिनी जा सकती है। गांव के प्रथम ग्रेजुएट अरुण कुमार राय भी मानते हैं कि नाम के अनुरूप यहां शिक्षा की स्थिति बदतर है। गौरतलब है कि इस गांव में मंडल, राय के साथ महादलित समुदाय के लोग रहते हैं। अधिकांश लोगों के जीने का जरिया मजदूरी अथवा कृषि है। पेट की भूख ने लोगों को शिक्षा से विमुख कर रखा है। यह स्थिति कहीं न कहीं कल्याणकारी योजनाओं में गड्डमड्ड का भी खुला संकेत है। हालांकि इस गांव के लोगों को यह गर्व जरूर है कि पूरे जिले में ही नहीं पूरे अंग क्षेत्र में उनके गांव का नाम चर्चित है। गांववासी परशुराम राय, जवाहर राय, दिलीप राय आदि बताते हैं कि इस गांव के नाम के पीछे बड़ी कहानी है। स्वतंत्रता संग्राम के समय यह क्षेत्र सेनानियों का मुख्य केन्द्र था। यहां से फिरंगियों के खिलाफ जंग की योजनाएं बनतीं थीं। जब इसकी भनक लगी तो फिरंगियों ने यहां एक कैम्प ही स्थापित कर दिया। बसेरा बन जाने के बाद अंग्रेजों ने क्षेत्र के लोगों पर जमकर कहर बरपाया। उसी समय से इस गांव को लोग इंगलिश गांव के नाम से पुकारने लगे। स्वतंत्रता प्राप्ति तक यह गांव खौफ का पर्याय बना रहा। हालांकि अब यहां निवास कर रहे लोग अपने मधुर व्यवहार व निश्चछलता के लिए जाने जाते हैं, जिन्हें ठगने में किसी ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। गांव तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क तो है, लेकिन अन्य बुनियादी सुविधाएं कहीं नहीं दिखतीं। ग्रामीणों के मुताबिक गांव में मध्य व उच्च विद्यालयों के लिए वे कई बार जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों के दरवाजे खटखटा चुके हैं, लेकिन उनकी आवाज हर जगह अनसुनी ही रही है। उन्हें भी यह बात साल रही है कि उनके इंगलिश गांव के सत्तर फीसदी लोग हिन्दी भी नहीं पढ़ पाते हैं।

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