इस स्कूल में खिलता है सर्वधर्म समभाव


बठिंडा( डॉ सुखपाल)- अलिफ, बे, ते, पे..ए, बी, सी..उड़ा, एड़ा, इड़ी, ससा..अ, आ, इ..! आप यह कतई न समझें कि आपको उर्दू, अंग्रेजी, पंजाबी, हिंदी भाषाओं के वर्ण सिखाए जा रहे हैं। बात हो रही है यहां के एक ऐसे स्कूल की, जिसमें तमाम भाषाएं मुफ्त सिखाई जाती हैं। एक इस्लामिक संगठन द्वारा संचालित इस स्कूल में मुसलमानों के अलावा हिंदू, सिख समेत कई धर्मो के बच्चे पढ़ते हैं। इसमें पढ़ाई के साथ-साथ सांप्रदायिक सद्भाव का कमल खिल रहा है। आवा बस्ती स्थित ईदगाह परिसर में पांच कमरों में चल रहे हाजीरतन इस्लामिया सर्वधर्म सांझा स्कूल में केंद्रीय विद्यालय नं.1 का जमा एक का विद्यार्थी आदिल बराड़ भी आता है। कहता है, मैं भविष्य में एमए उर्दू व अरबी की जरूरत को देखते हुए यहां से शिक्षा ले रहा हूं। इसके अलावा सभी धर्मो के लोगों को एक ही छत के नीचे अलग-अलग भाषाओं का ज्ञान हासिल करते देखना बेहद सौहार्दपूर्ण लगता है। हिंदू विद्यार्थी शेखर कुमार कहता है, उर्दू ज्ञान की वजह से ईदगाह में आने की मेरी झिझक दूर हुई है। अज्ञानता से उबरने के लिए लोग स्कूलों का रुख करते हैं, जहां डिग्री-डिप्लोमाधारक नागरिक जन्म लेते हैं। परंतु सही मायने में मानवीय मूल्यों का ज्ञान ही इंसान बनाता है। इस विचार का अनुसरण करते हुए मुस्लिम ह्यूमन वेलफेयर सोसाइटी ने यह स्कूल खोला। इसमें उर्दू, फारसी, अरबी के अतिरिक्त हिंदी, पंजाबी, अंग्रेजी का अक्षर ज्ञान नि:शुल्क प्रदान किया जाता है।इस स्कूल का नींव पत्थर 24 अक्टूबर 2006 को प्रदेश के तत्कालीन वित्तमंत्री सुरेंद्र सिंगला ने रखा था। इमारत के नाम पर यहां महज पलस्तर किए पांच कमरों में से दो में ही खिड़की-दरवाजे लगे हैं। स्कूल की शक्लो-सूरत पर न जाएं बल्कि यहां दी जाने वाली नसीहत पर गौर फरमाएं। दोपहर बाद 3.30 से सायं 6 बजे तक लगने वाले स्कूल में मौलवी मोहम्मद असगर अली, सैयद फरीदूद्दीन, हाफिज मोहम्मद सलीम एवं शानेआलम बच्चों को भाषाएं पढ़ाते हैं। सोसाइटी की कोशिशों का ही नतीजा है कि बीते सितंबर की 24 तारीख को शुरू हुए इस स्कूल में संजय नगर, आवा बस्ती समेत आसपास के इलाके से लगभग 50 बच्चे पढ़ने आते हैं। मुस्लिम ह्यूमन वेलफेयर सोसाइटी के प्रधान सुखदेव खान बताते हैं कि सीमित संसाधनों के चलते आधी-अधूरी बिल्डिंग में शिक्षण कार्य चलाया जा रहा है। बाकी निर्माण कार्य बकरीद के बाद, 28 नवंबर से शुरू कर इसेएक बेहतरीन स्कूल बनाया जाएगा। इसमें अप्रैल 2010 से नर्सरी, यूकेजी, एलकेजी की कक्षाएं भी शुरू कर दी जाएंगी। सुबह व शाम, दोनों समय स्कूल लगेगा। काजी-ए-शहर मौलवी मोहम्मद रमजान फरमाते हैं कि उर्दू महज मुसलमानों की भाषा नहीं, बल्कि इसका सृजन तो बाबर के हिंदुस्तान आगमन पर अरबी, फारसी व संस्कृत के संगम से हुआ है। एक ही छत तले सभी भाषाओं का ज्ञान देने का मकसद दुनियावी तालीम के माध्यम से सांप्रदायिक सद्भाव बढ़ाना है। हर मजहब में आपस में प्रेमभाव बढ़ाने का पाठ तो है पर इस पर क्रियान्वयन लाजिमी है। विगत में पटवारी, कानूनगो के लिए उर्दू ज्ञान अनिवार्य होने पर उनके मन में चल रहे उर्दू के प्रचार-प्रसार के ख्याल को इन्होंने इस स्कूल के रूप में अमली जामा पहनाया।

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