बा अदब, बा मुलाहजा..नवाब साहब आ रहे हैं!


नवाब मियां सैयद नकी रजा। उम्र करीब 70 बरस। पता-कश्मीरी मोहल्ला, लखनऊ, लेकिन यह उनकी पूरी पहचान नहीं है। असल पहचान को जिंदा रखने के लिए इस बुजुर्ग को कितने पापड़ बेलने पड़ रहे हैं, जरा गौर फरमाइये। नवाब साहब अवध की बहू बेगम के वंशज हैं। उन्हें वसीका (अंग्रेजों के जमाने से नवाबों की संपत्तियों के बदले उनके वंशजों को मिलने वाली पेंशन) मिलता है। नवाब साहब के घर से वसीका दफ्तर तक रिक्शे का किराया 25 रुपये है। यानि वसीका लेने के लिए उन्हें किराये के 50 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इस उम्र में आने-जाने और दफ्तर में लगने वाले दो-तीन घंटे का वक्त भी कितना तकलीफदेह होता होगा, उसे भी आसानी से समझा जा सकता है। नवाब साहब को वसीका कितना मिलता है, यह सुनकर आप चौक जाएंगे। सिर्फ दो रुपये 98 पैसे महीने! इस बावत सवाल करने पर नवाब साहब नाराज हो जाते हैं, कहते हैं, तो क्या मैं अपनी पहचान को भी खत्म कर दूं? यही तो एक दस्तावेजी सबूत है, वर्ना एक अरब की आबादी में कौन यकीन करेगा कि यह बूढ़ा बहू बेगम का वंशज है। मैं अपनी तकलीफ, आराम के लिए अपनी आने वाली नस्लों से नइंसाफी नहीं कर सकता। अपने जीते जी, मैं ऐसा नहीं होने दूंगा। अपनी पहचान जिंदा बनाए रखने के लिए जद्दोजहद करने वाले नवाब मियां सैयद नकी रजा अकेले नहीं है। अवध के शासकों के करीब 1700 वशंज इस तरह की जद्दोजहद में शामिल हैं। सभी को वसीका मिल रहा है, लेकिन यह रकम एक रुपये, दो रुपये, पांच रुपये, दस रुपये बीस रुपये है। कुछ ही खुशकिस्मत हैं, जिन्हें चार सौ या पांच सौ रुपये मिलते हैं। इनके लिए रकम उतनी महत्वपूर्ण नहीं है, जितना अपनी पहचान को जिंदा रखना। यही वजह है कि जो रकम सुनने में बहुत मामूली लगती है, उसे हासिल करने के लिए होने वाली जहमत उनके लिए कोई मायने नहीं रखती। वाजिद अली शाह के खानदानी शाह आलम से ही मिलिए। सवा पांच रुपये महीने वसीका मिलता है। वह खुद सवाल करते हैं, सवा पांच रुपये इस दौर में क्या मायने रखते हैं? पर इसे लेने में उनके सौ रुपये खर्च हो जाते हैं। इसके लिए इतनी जिद्दोजहद क्यों? जवाब लगभग वही, बात सवा पांच रुपये की नहीं है। बात अपनी जड़ों को सींचते रहने की है। हम जिस रोज सवा पांच रुपये लेना छोड़ देंगे, उस दिन हम अपनी जड़ काट देंगे। ऊपर से जो नस्ल चली आ रही है, वह कहां तक पहुंची यह पहचान खत्म। हम कौन हैं, हमारे बच्चे किस खानदान से ताल्लुक रखते हैं, यह पहचान भी खत्म। शाह आलम कहते हैं, सवा पांच रुपये के लिए सवा पांच हजार रुपये खर्च करने पड़ेंगे तो भी मैं तैयार रहूंगा। एक और वसीकेदार हैं काजिम अली खां। वह मोहम्मद अली शाह के वजीर रफीकउददौला बहादुर के वंशज हैं। इन्हें 26 रुपये वसीका मिलता है। कबूतरबाजी के शौकीन खां साहब कहते हैं कि उनके कबूतर ही महीने में तीन सौ रुपये का दाना खा जाते हैं। साढ़े पांच रुपये पाने वाली मलका बेगम भी पहचान के लिए जूझ रही हैं।

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