कंगारुओं के देश में भी जलते हैं खेत


( डॉ सुखपाल)-

फसल देने के बाद पंजाब के खेत जलते हैं तो उनसे उठने वाला धुआं मीलों तक अपनी कालिख के साथ-साथ लोगों के लिए परेशानी बिखेरता है। कारण यह है कि इन खेतों में गेहूं और धान के साथ पैदा होने वाली पराली को ठिकाने लगाने का कोई उचित तरीका किसान जानते ही नहीं, लिहाजा उसे जला देना ही उनके लिए सबसे सरल काम है। बात सिर्फ पंजाब की ही नहीं है, यहां से हजारों मील दूर विकसित कहे जाने वाले आस्ट्रेलिया में भी किसान अपने खेतों में फसल के साथ पैदा होने वाली पराली जलाते हैं और वहां की सरकार भी इससे परेशान है। इस समस्या से निजात पाने के लिए आस्ट्रेलिया पंजाब की मदद ले रहा है। यह समस्या कितनी गंभीर है, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि अकेले धान के सीजन में प्रतिवर्ष 18 मिलियन टन से अधिक पराली खेतों में फूंक दी जाती है। पंजाब किसान आयोग के सलाहकार डा. पीएस रंगी ने दैनिक जागरण को बताया कि आस्ट्रेलिया भी पराली जलाने की समस्या से पीडि़त है। इस समस्या का कोई समाधान लेने के उद्देश्य से आस्ट्रेलिया के एनएसडब्ल्यू प्राइमरी इंडस्ट्री विभाग के डा. जैसन कारेन और डा. रजिंदर सिंह पिछले हफ्ते पंजाब दौरे पर थे। पराली जलाने की समस्या को जड़ से उखाड़ फेंकने के संयुक्त अभियान के तहत पिछले सप्ताह पंजाब किसान आयोग, कृषि विभाग, बिजली विभाग, पंजाब प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड, गैर परंपरागत ऊर्जा विकास एजेंसी, साइंस, टेक्नोलोजी एवं पर्यावरण विभाग, सहकारिता, इंडस्ट्री विभाग और पीएयू के रिसर्च विभाग के उच्च अधिकारियों की बैठक में आस्ट्रेलिया सरकार के उक्त दोनों नुमाइंदे भी उपस्थित थे। पराली जलाने के बजाय उसके सदुपयोग के लिए लुधियाना स्थित पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग कालेज में रेजेड्यू मैनेजमेंट प्रोजेक्ट चल रहा है। इस प्रोजेक्ट को आस्ट्रेलिया सरकार फंड कर रही है। प्रोजेक्ट में गेहूं की बिजाई करने वाली अत्याधुनिक मशीन हैपी सीडर विकसित की गई है। पंजाब में इस मशीन की सफलता के बाद इसे आस्ट्रेलिया में अपनाने की योजना है। पंजाब सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए जहां हैपी सीडर बिजाई मशीनों को प्रोत्साहित करने के लिए पंजाब किसान आयोग को 40 लाख रुपये की सब्सिडी राशि दे दी है, वहीं पहली बार एक करोड़ 60 लाख रुपये की सब्सिडी बेलर उपकरण मुहैया कराने के लिए पंजाब किसान आयोग को दी गई है। बेलर में पराली को काटने वाला श्रेडर, कटी हुई पराली को एकत्र करने वाला रेकर और उसकी गांठ बांधने वाला बेलर शामिल होता है। इस समूची यूनिट की कीमत लगभग 11 लाख रुपये है जिस पर पंजाब किसान आयोग 5 लाख रुपये तक की सब्सिडी देगा। इस सब्सिडी को किसान, कृषि केंद्र, चीनी मिलें, पेपर मिल, को-जनरेशन यूनिट और बायो ऊर्जा पर आधारित इंडस्ट्री यूनिट भी हासिल कर सकेंगे। बेलर तकनीक से किसान के खेत से पराली के बंडल बनाकर संबंधित को-जनरेशन यूनिटों एवं पेपर मिलों तक पहुंचाया जा सकेगा। हैपी सीडर ड्रिल एक साथ धान के ठूंठ और पराली को काटकर गेहूं की बिजाई करता है। इसके कारण धान का कचरा जलाने या खेत से हटाने की जरूरत नहीं रहती। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार इस तकनीक के माध्यम से ही 85 फीसदी पराली खेत में ही निपटाई जा सकेगी और यह खेत में खाद का भी काम करेगी। पंजाब कृषि विभाग के निदेशक डा. बीएस सिद्धू ने कहा कि पंजाब सरकार किसानों को पराली की समस्या का पक्का हल ढूंढने का गंभीर प्रयास कर रही है। उनमें हैपी सीडर के बाद बेलर तकनीक नई खोज है।

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