घनी आबादी में लगाए जा रहे मोबाइल टावर पर कोर्ट सख्त


लखनऊ- इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने प्रदेश में मोबाइल फोन टावरों के मकड़जाल से उत्पन्न प्रदूषण व वातावरण पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव के मामले में कड़ी टिप्पणी की है। पीठ ने यह जानना चाहा है कि मोबाइल कम्पनियों के टावर व्यक्तिगत लोगों की छतों पर और संस्थानों पर किस नियम कायदे से बेतहाशा लगाये जा रहे हैं। यह आदेश न्यायमूर्ति प्रदीप कांत व न्यायमूर्ति रितुराज अवस्थी की खंडपीठ ने याची सुरेश चन्द्र सिंह की ओर से प्रस्तुत याचिका पर दिए। इस मामले में अगली सुनवाई 23 अक्टूबर को नियत की गयी है। अदालत ने कहा कि यह बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है कि घनी आबादी में जहां पर आम आदमी निवास करता है उन घरों की छतों पर और बस्तियों में आम आदमी की जिंदगी पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले इन मोबाइल टावरों को लोगों की मर्जी से लगाया जा रहा है अथवा उनकी गैर मर्जी से। पीठ ने कहा 24 घंटे प्रदूषण को फैलाने वाले तथा बड़े-बड़े जनरेटरों और मशीनों के चलने से आम जनजीवन के स्वास्थ्य और पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है तथा लोगों के जीवन पर इसका विपरीत असर पड़ रहा है। पीठ ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि आम जनता के विरोध के बावजूद भी घनी आबादी में यह फोन टावर किस नियम कायदे से लगाये जा रहे हैं। पीठ ने कहा कि राज्य सरकार ने इस मामले में 2008 में कुछ दिशा निर्देश तय किए थे किंतु आज तक वह लागू नहीं किए गए, इसलिए यह जांच का विषय है। सरकार जांच करे कि मोबाइल कंपनियां किस विभाग व अधिकारी से अथवा स्थानीय निवासियों से सहमति प्राप्त कर यह टावर लगा रही है। बाराबंकी जिले में टावर लगाए जाने के मामले में याची ने एसडीएम को आवेदन दिया जिस पर उपजिलाधिकारी व जिलाधिकारी ने टावर निर्माण पर रोक लगा दी थी लेकिन टावर कंपनी के लोग नहीं माने।

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