टूट नहीं रही जाति की बेडि़यां



( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)- : भले ही जातिवाद को असभ्य समाज की देन माना जाता है और चुनाव आयोग ने भी जातीय प्रतीक के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा रखी है मगर इसके बावजूद सच यह है कि आज भी भारतीय लोकतंत्र में चुनाव के वक्त जातीय समीकरणों का तिकड़म लगाया जाता है। हरियाणा में भी टिकट देने, मंत्री बनाने व मुख्यमंत्री बनाने तक में जातीय तालमेल व नुमाइंदगी को देखा जाता है। हरियाणा में आर्य समाज का आंदोलन भी क्रूर जाति व्यवस्था के सम्मुख बौना पड़ गया। पहली नवंबर 1966 को पंजाब से अलग होकर हरियाणा स्वतंत्र प्रदेश के रूप में अस्तित्व में आया। तबविधानसभा में कुल 54 सदस्य थे। सही मायने में दूसरी विधानसभा ही नवसर्जित हरियाणा की अपनी विधानसभा थी। इसके लिए 9 फरवरी 1967 को चुनाव हुए। तब से आज तक के परिणामों पर नजर डालें तो जातीय आधार पर प्रतिनिधित्व का आंकड़ा सिद्ध करता है कि ताकतवर जातियों में अपना वर्चस्व बढ़ाने की प्रवृति में लगातार इजाफा हो रहा है। दूसरी विधानसभा जो मुश्किल से 15 महीने चली, इसमें सर्वाधिक जनसंख्या वाली जाट जाति के 23 विधायक थे। इसके अलावा 13 बनिया, आठ पंजाबी, सात यादव, दो ब्राह्मण, दो रोड, एक सिख, एक बिश्नोई व 15 दलित विधायक थे। दूसरी विधानसभा में विधायकों की कुल संख्या 81 थी। तीसरी विधानसभा के लिए 12 व 14 मई, 1968 को मतदान हुआ। चुनाव के बाद जो तस्वीर सामने उभरी उसमें जाट 22, पंजाबी 8, बनिया 10, यादव 7, बिश्नोई दो, सैनी 2 व दलित पंद्रह की संख्या में विधायक बने। राज्य की चौथी विधानसभा के लिए 11 मार्च, 1972 को चुनाव हुए। इस बार जाट 23, बनिया 11, पंजाबी 8, यादव 6, ब्राह्मण 5, मुस्लिम 2, गुज्जर 2, राजपूत एक, रोड़ 2, सिख 2, बिश्नोई 2, सैनी एक, कंबोज एक तथा 15 दलित विधायक बने। 5वीं विधानसभा में विधायकों की संख्या नब्बे हुई तो जाट विधायकों की संख्या भी काफी बढ़ गई। इस बार 32 जाट, 8 बनिया, 8 पंजाबी, 5 यादव, 17 दलित विधायक चुने गए। इस चुनाव में आरक्षित सीटों की संख्या 17 हो गई थी। छठी विधानसभा के लिए मई 1982 में चुनाव हुए। इस बार भी जाट विधायकों की संख्या 32 ही थी जबकि बनिया समुदाय की संख्या 5वीं विधानसभा का आधा रह गई यानी कि महज चार विधायक। सातवीं विधानसभा में 26 जाट, 4 बनिया, 9 पंजाबी, 5 यादव, 8 ब्राह्मण व आरक्षित सीटों पर 17 दलित विधायक चुने गए। आठवीं विधानसभा जिसका कार्यकाल 1991 से 1996 तक रहा, में जाटों की संख्या बढ़कर 31 हो गई। इसमें 4 बनिया, 11 पंजाबी, 4 यादव, 4 ब्राह्मण, 5 मुस्लिम, 5 गुर्जर, 3 राजपूत, एक रोड़, 2 सिख व 17 दलित विधायक चुने गए। 9वीं विधानसभा जो 2000 तक चली में 28 जाट, 9 बनिया, 8 पंजाबी, 5 यादव, 6 ब्राह्मण, 3 मुस्लिम, 2 गुज्जर, 3 राजपूत, 2 सिख, 3 बिश्नोई, 2 सैनी, एक कंबोज, एक सुनार व 17 दलित विधायक थे। दसवीं विधानसभा में 32 जाट, 4 बनिया,11 पंजाबी, 6 यादव व 17 दलित विधायक विधानसभा पहुंचे। इस विधानसभा में 32 जाट विधायकों में से 21 इनेलो के खाते में तो 6 कांग्रेसी थे। दो निर्दलीय विधायक भी जाट समुदाय से चुने गए। ग्यारहवीं विधानसभा में जाटों की संख्या घटकर 26 हो गई। इस बार गुज्जर 6, ब्राह्मण 8, बनिया 4, यादव 5, बिश्नोई 3, पंजाबी 8, मुस्लिम 3, राजपूत 4, दलित 17 तथा अन्य से छह विधायक चुनकर विधानसभा पहुंचे।

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