एक और हैट्रिक पर हुड्डा की निगाह


( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)- लोकसभा चुनाव में जीत की हैट्रिक बनाने वाले मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की निगाह अब एक और हैट्रिक पर लगी है। इस हैट्रिक का फर्क बस इतना है कि पहले जीत की तिकड़ी लोकसभा चुनाव में बनाई थी, अब विधानसभा में जीत की यही कहानी दोहराना चाहेंगे। यदि मुख्यमंत्री विधानसभा चुनाव में जीत जाते हैं तो वे प्रदेश के दूसरे ऐसे राजनीतिज्ञ होंगे, जिनके खाते में चुनाव के दोनों संस्करणों (लोकसभा और विधानसभा) में जीत की हैट्रिक दर्ज होगी। लोकसभा व विधानसभा में हैट्रिक बनाने का विरला कारनामा पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल भी कर चुके हैं। बंसीलाल 1980, 1984 व 1989 के लोकसभा चुनाव और 1967, 1968 व 1972 के विधानसभा चुनाव जीतकर तिकड़ी बना चुके हैं। हरियाणा के अस्तित्व में आने के बाद से किलोई हलके में विपक्ष का कुछ ज्यादा ही बोलबाला था। यह भी संयोग ही रहा कि किलोई हलके से जीत की बोहनी मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के पिता रणबीर सिंह हुड्डा ने की। इसके बाद लगातार कांग्रेस प्रत्याशी हारते रहे, यह सिलसिला 1991 तक चलता रहा। इस चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी कृष्णमूर्ति हुड्डा जीते। इसके साथ ही हुए लोकसभा चुनाव में भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने रोहतक लोकसभा सीट से पहली जीत दर्ज की। भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने 1991, 1996 व 1998 के लोकसभा चुनाव में पूर्व उपप्रधानमंत्री देवीलाल को लगातार तीन बार पटखनी दी थी। वर्ष 2000 व 2005 में हुए उपचुनाव में जीतकर हुड्डा विधानसभा पहंुचे। किलोई उपचुनाव में मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने करीब 96 प्रतिशत मत लेकर नया रिकार्ड कायम किया था। नए परिसीमन के बाद किलोई से गढ़ी-सांपला-किलोई बने इस हलके में लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस प्रत्याशी दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने 87 हजार 908 मत हासिल किए थे। इनेलो प्रत्याशी नफे सिंह राठी केवल 10 हजार 99 वोट ले पाए थे। जीत के इसी दौर के बीच 1996 के विधानसभा चुनाव में किलोई और 1999 लोकसभा चुनाव में हार का भी सामना करना पड़ा। इनेलो ने इस वीआईपी सीट से नए चेहरे सतीश नांदल को उतारा है। भाजपा, हजकां व बसपा ने अपने पत्ते अभी नहीं खोले हैं। वैसे, कांग्रेसी पिछले कुछ समय से मुख्यमंत्री को रोहतक विधानसभा से चुनाव लड़ने का न्यौता दे रहे हैं। यह सीट शादीलाल बतरा के राज्यसभा में भेजे जाने के बाद खाली हुई है। यहां कुछ बदलाव होगा, कहना मुश्किल है। फिर भी राजनीति में कुछ भी होने की संभावना हमेशा बनी रहती है।

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