जमानत गई तो क्या नाम तो हुआ


( डॉ सुखपाल सावंत खेडा)- : हरियाणा विधानसभा चुनाव में जमानत जब्त कराकर घर बैठने वाले नेताओं की संख्या हर बार बढ़ती जा रही है। चुनाव आयोग द्वारा नामांकन की फीस दस गुणा अधिक बढ़ा दिए जाने के बावजूद नेताओं में चुनाव लड़ने का क्रेज कम नहीं हुआ है। गैर कद्दावर, मुद्दाविहीन और चुनाव के मौसम में अचानक प्रकट होने वाले इन नेताओं को जनता ने हर बार बुरी तरह से सबक सिखाया है। निर्दलीय उम्मीदवारों को यदि नजरअंदाज कर दिया जाए तो विभिन्न पार्टियों के नेताओं को भी थोक में अपनी जमानतें जब्त करानी पड़ी हैं। प्रदेश में विधानसभा चुनाव की शुरुआत 1967 में हुई। तभी से नेताओं में चुनाव लड़कर जनता का प्रतिनिधित्व करने की आपाधापी मची हुई है। चुनाव लड़ने वाले तमाम गैर कद्दावर और मुद्दाविहीन नेताओं को जनता ने भी पराजय का स्वाद चखाने में कोई कंजूसी नहीं बरती है। लोगों ने चुनाव में उन्हीं राजनेताओं के प्रति अपना विश्वास जाहिर किया, जिन्हें वह राजनीतिक तौर पर जानते हैं और उनकी नीतियों तथा मुद्दों से इत्तफाक रखते हैं। हरियाणा विधानसभा के प्रत्येक चुनाव में ताल ठोंकने वाले उम्मीदवारों में हालांकि निर्दलीयों की संख्या बहुत ज्यादा रही है, लेकिन विभिन्न पार्टियों के बैनर तले चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की संख्या भी तीन से चार अंकों में दर्ज की गई है। विधानसभा चुनाव की शुरुआत के बाद कोई भी उम्मीदवार 500 रुपये की जमानत राशि जमा कराकर पर्चा दाखिल करने में देरी नहीं लगाता था। ऐसे नेताओं की सोच सरकारी कागजों में अपना नाम दर्ज कराकर चर्चा में आने तक सीमित होती थी। उनकी सोच को खारिज करने के उद्देश्य से वर्ष 2000 से जमानत राशि दस गुणा बढ़ाकर पांच हजार रुपये कर दी गई है। चुनाव आयोग का मानना था कि जमानत राशि बढ़ाने के बाद बिना वजह चुनाव लड़ने वाले नेताओं की संख्या पर रोक लग सकेगी, लेकिन परिणाम चुनाव अधिकारियों की सोच के विपरीत आए हैं। वर्ष 2000 और 2005 के चुनाव में ही 961 आजाद उम्मीदवार मैदान में उतरे तथा 894 की जमानत राशि जब्त हो गई। अकेले निर्दलीय उम्मीदवारों की जब्त यह राशि करीब 45 लाख रुपये बैठती है। निर्दलीय उम्मीदवारों की जब्त जमानत राशि का यदि जिक्र नहीं भी किया जाए तो प्रमुख पार्टियों के उम्मीदवार भी जमानत जब्त कराने में पीछे नहीं रहे हैं। वर्ष 2000 के विधानसभा चुनाव में प्रमुख पार्टियों के 916 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा और उनमें से 86 की जीत हुई जबकि 717 की जमानतें जब्त हो गई। इन नेताओं की जमानत जब्त होने संबंधी राशि करीब 35 लाख रुपये बैठती है। वर्ष 2005 में चुनाव आयोग के खाते में जमा जब्त जमानत राशि 40 लाख रुपये बताई जाती है, जबकि इसमें निर्दलीय उम्मीदवारों की जमानत जब्त होने से आई रकम शामिल नहीं है। भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला और प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी सज्जन सिंह का जोर हालांकि चुनाव खर्च कम करने की तरफ है, मगर निर्दलीय और प्रमुख पार्टियों के नेताओं के चुनाव लड़ने के बढ़ते क्रेज से वह चिंतित भी हैं। सज्जन सिंह का मानना है कि चुनाव व्यवस्थाओं में सुधार किया जा रहा है। आयोग की कोशिश है कि कम खर्च में बेहतर परिणाम ले लिए जाएं। विधानसभा चुनाव के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 1967 में 294 ऐसे उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई है, जो निर्दलीय तो नहीं थे, मगर प्रमुख पार्टियों के साथ-साथ क्षेत्रीय पार्टियों के बैनर तले उन्होंने जीत के लिए जनता के द्वार पर दस्तक दी। वर्ष 1968 में 212, 1972 में 206, 1977 में 466, 1982 में 874, 1987 में 1099 और वर्ष 1991 के विधानसभा चुनाव में 134 प्रमुख उम्मीदवारों की जमानत जब्त कर उनकी राशि को चुनाव आयोग के खाते में जमा कराया गया है। वर्ष 1996 के चुनाव में 538, वर्ष 2000 में 717 और वर्ष 2005 के विधानसभा चुनाव में 728 उम्मीदवारों को अपनी जमानत राशि जब्त करानी पड़ी है। इनमें निर्दलीय उम्मीदवारों की जमानत जब्त होने का आंकड़ा शामिल नहीं किया गया है। चुनाव आयोग के अधिकारियों के मुताबिक जब जमानत राशि कम थी तब भी और अब राशि अधिक होने के बावजूद दावेदारों में चुनाव लड़ने का क्रेज बरकरार है।

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