बेक़सूर ने 28 साल की जेल काटी


सईदुल हक़ इतने लंबे अरसे तक जेल में रहने के बाद सुनहरे दिनों के साथ-साथ अपनी वाकशक्ति भी खो चुके हैं
पाकिस्तान में पुलिस और प्रशासन की ग़ैरज़िम्मेदारी या कोताही का एक गंभीर मामला सामने आया है.

एक व्यक्ति को इस आरोप में जेल में बंद कर दिया गया था कि उसने किसी व्यक्ति की हत्या की है लेकिन अब 38 साल बाद जाकर कराची की एक अदालत ने पाया कि उसके ख़िलाफ़ पुलिस के पास कोई सबूत ही नहीं हैं.

इस व्यक्ति को बरी करते समय कोई मुआवज़ा देने की ज़रूरत भी नहीं समझी गई.

85 वर्ष के एक बुज़ुर्ग सईदुल हक़ को दस वर्ष पहले उन्हें जेल से तो रिहा कर दिया गया था लेकिन उन्हें बरी करने में दस साल और लग गए.

पुलिस ने 28 वर्ष की अवधि में न तो सईदुल हक़ के ख़िलाफ़ कोई चालान पेश किया और न ही उन्हें अदालत में पेश किया गया.

अपनी ज़िंदगी का सुनहरा दौर जेल में गुज़ारने वाले सईदुल हक़ को 1971 में कराची में हुई एक व्यक्ति की हत्या के संदेह में गिरफ़्तार किया गया था.

पुलिस के पास मौजूद एफ़आईआर की बहुत की जर्जर सी कॉपी में न तो मारे गए व्यक्ति का कोई नाम पता लिखा है और न कोई गवाह है.

दिलचस्प बात ये है कि एफ़आईआर में सईदुल हक़ का नाम भी शामिल नहीं है, बस पुलिस ने उन्हें सिर्फ़ शक़ के आधार पर गिरफ़्तार कर लिया था और बस उसके बाद किसी ने भी उसकी सुध नहीं ली.

सब कुछ खोया

अब अपनी उम्र का सुनहरा दौर, रिश्तेदार और बोलने की ताक़त खो जुके सईदुल हक़ की क़िस्मत उस समय कुछ पलटती नज़र आई जब जेल सुधार कमेटी के सदस्य एडवोकेट क़ादर ख़ान मंदोख़ेल ने उस सेंट्रल जेल का दौरा किया जिसमें सईदुल हक़ बंद थे.

मैंने उस समय के प्रधानमंत्री मियाँ नवाज़ शरीफ़ को पत्र लिखा कि एक ऐसा क़ैदी है जिसका कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है मगर वहाँ से कोई जवाब नहीं आया. उसके बाद हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई जिसमें पुलिस महानिरीक्षक, कोतवाल और जेल महानिरीक्षक प्रतिवादी बनाया गया. जब हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड तलब किया तो पता चला कि उसका कोई रिकॉर्ड उनके पास भी नहीं था.
क़ादर ख़ान मंदोख़ेल
एडवोकेट क़ादर ख़ान मंदोख़ेल ने बताया कि जब उन्होंने विवरण मालूम किया तो पता चला कि वो पुलिस की ज़्यादतियों की वजह से मानसिक संतुलन खो बैठे हैं और बेहद कमज़ोर हो चुके थे.

क़ादर ख़ान ने बताया, “मैंने उस समय के प्रधानमंत्री मियाँ नवाज़ शरीफ़ को पत्र लिखा कि एक ऐसा क़ैदी है जिसका कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है मगर वहाँ से कोई जवाब नहीं आया. उसके बाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई जिसमें पुलिस महानिरीक्षक, कोतवाल और जेल महानिरीक्षक प्रतिवादी बनाया गया. जब हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड तलब किया तो पता चला कि उसका कोई रिकॉर्ड उनके पास भी नहीं था.”

1999 से में सिंध हाई कोर्ट के जस्टिस नाज़िम हुसैन सिद्दीक़ी ने सईदुल हक़ को दो हज़ार रुपए के निजी मुचलके पर क़ादर ख़ान मंदोख़ेल ट्रस्ट के हवाले किया और उनके इलाज की जिम्मेदारी ट्रस्ट को सौंपी गई, साथ ही यह कहा गया कि अगर सईदुल हक़ की फ़ाइल मिली तो उन्हें अदालत में पेश किया जाएगा.

पिछले दस वर्ष से सईदुल हक़ आज़ाद हैं मगर इस अवधि में न तो उनकी वाक शक्ति वापिस आ सकी है और न ही किसी रिश्तेदार का पता चल सका है.

क़ादर मंदोख़ेल ट्रस्ट में सईदुल हक़ की सुबह और शाम ऐसे ही ख़ामोशी के साथ गुज़र रही है जैसे वो ख़ुद हैं यानी बिल्कुल ख़ामोश.

कोई रिकॉर्ड नहीं

क़ादर मंदोख़ेल ने बीते वर्ष सईदुल हक़ को बरी किए जाने के लिए ज़िला और सत्र न्यायाधीश की अदालत में याचिका दायर की थी जिस पर अदालत ने संबंधित पुलिस थाने को नोटिस जारी करके मुक़दमे की फ़ाइल पेश करने को कहा था.

क़ादर मंदोख़ेल के अनुसार तीन तारीख़ों के बाद पुलिस ने अदालत को बताया कि उनका सईदुल हक़ का न तो कोई रिकॉर्ड मौजूद है और न ही मिलने की उम्मीद है, जिस पर अदालत ने हक़ को बरी कर दिया.

एडवोकेट मंदोख़ेल सईदुल हक़ को इस अपराध से बरी किए जाने के लिए बहुत बड़ा सौभाग्य समझते हैं मगर उनका कहना है कि अदालत को सईदुल हक़ को मुआवज़ा देने के भी आदेश देने चाहिए थे.

सिर्फ़ एक एफ़आईर नंबर – 230/1971 का अड़तीस वर्ष तक बोझ उठाने वाले सईदुल हक़ अब अपना वज़न उठाने लायक़ भी नहीं बचे हैं.

इतने लंबे अरसे तक किसी ने भी उनकी सुध नहीं ली और न ही किसी ने उनकी फ़रियाद सुनी और अब जब बरी हो चुके हैं तो अपना दुखड़ा किसी को सुनाने के योग्य नहीं बचे हैं क्योंकि वो बोल ही नहीं सकते हैं.

सईदुल हक़ की टेलीविज़न चैनलों पर दिखाई जाने वाली तस्वीर से ही एडवोकेट क़ादर मंदोख़ेल ये आस लगाए बैठे हैं कि हो सकता है कि कोई उनको पहचान ले और उन्हें लेने के लिए आ जाए.

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